बरेली: कई घरों में पल रहे प्रतिबंधित नस्ल के कुत्ते, दस हजार में से सिर्फ 500 सौ का पंजीकरण। शहर में कुत्तों का आतंक बढ़ रहा है लेकिन नगर निगम की निगरानी कमजोर है। दस हजार पालतू कुत्तों में से सिर्फ डेढ़ सौ का ही पंजीकरण हुआ है। कई घरों में प्रतिबंधित नस्ल के कुत्ते पाले जा रहे हैं। बरेली में कुत्त

बरेली: कई घरों में पल रहे प्रतिबंधित नस्ल के कुत्ते, दस हजार में से सिर्फ 500 सौ का पंजीकरण।
शहर में कुत्तों का आतंक बढ़ रहा है लेकिन नगर निगम की निगरानी कमजोर है। दस हजार पालतू कुत्तों में से सिर्फ डेढ़ सौ का ही पंजीकरण हुआ है। कई घरों में प्रतिबंधित नस्ल के कुत्ते पाले जा रहे हैं। बरेली में कुत्तों के बढ़ते आतंक के बावजूद नगर निगम की मुस्तैदी और निगरानी सिर्फ दावों तक सीमित है। कई घरों में प्रतिबंधित नस्ल के कुत्ते पल रहे हैं। अनुमान के मुताबिक, शहर में दस हजार पालतू कुत्ते बीते वर्ष लखनऊ, नोएडा व अन्य जिलों में खूंखार नस्ल के कुत्तों के मालिक पर हमलावर होने और नोचकर मार डालने के मामले सामने आए थे। इनका संज्ञान लेकर नगर निगम ने शहर में 23 खूंखार नस्ल के कुत्ते पालने पर प्रतिबंध का प्रस्ताव स्वीकृति के लिए शासन को भेजा था। पंजीकरण शुल्क 10 रुपये से बढ़ाकर छोटे कद के कुत्तों के लिए पांच सौ और बड़े कद के कुत्तों के लिए पांच हजार रुपये सालाना प्रस्तावित किया था। अभी प्रस्ताव शासन के पास विचाराधीन है।
फिलहाल, पंजीकरण की पुरानी व्यवस्था ही प्रभावी है। इसमें पालतू कुत्ते का नियमित टीकाकरण कराने, व्यवहार परिवर्तन की दशा में पशु चिकित्साधिकारी से जांच कराने, गंदगी की सफाई समेत अन्य शर्तें भी प्रस्तावित थीं। बताते हैं कि निगम ने कुत्तों के पंजीकरण के लिए सिर्फ पॉश कॉलोनियों में ही अभियान चलाया। सीमित पंजीकरण ही हुए। रॉटविलर, पिटबुल भी पल रहे नगर निगम ने 23 नस्ल को प्रतिबंधित माना है। इसमें पिटबुल, अमेरिकन बुलडॉग, रोडेशियन रिजबैक, साउथ रशियन शेफर्ड डॉग, रॉटविलर, पिटबुल टेरियर, वोल्फ डॉग, मास्को गार्ड, केन कार्सो, जापानीज टोसा, अकीता, मस्तीफ, कैनेरियो, बैंडडॉग, टोसा इनू, काकेशियन शेफर्ड डॉग, फिला ब्राजीलेरियो, अक्वाश, सेंट्रल एशियन शेफर्ड डॉग, टेरियर्स, अमेरिकन स्टैफोर्डशायर टेरियर, कैंगल, डोगो अर्जेंटीनो, बोजबोएल, तोरनजैक सरप्लैनिनॉक शामिल हैं। अब तक के सर्वे में शहर में रॉटविलर, केन कोरसो, पिटबुल नस्ल के कुत्तों के पाले जाने का पता चला है।
वर्ष 2015 से खूंखार नस्ल पालने का चलन, अब भा रहे टॉय डॉग डॉग ब्रीड एक्सपर्ट पम्मी सिविल लाइंस में 25 वर्षों से पेट शॉप संचालित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि तब लोग विदेशी नस्ल में पग, लैब्राडोर पालते थे। 2005 के बाद जर्मन शेफर्ड, डाबरमैन खूब पले। 2015 के बाद खूंखार नस्ल लोगों की पसंद बनी। रॉटविलर, पिटबुल, केन कोरसो की मांग बढ़ी। घातक हमले सुर्खियां बने तो क्रेज घटा। अब टॉय ब्रीड सिटजू, पाम की मांग बढ़ी है।
सामान्य से अलग होता है पालन का तरीका रामपुर गार्डन में रॉटविलर पाल रहे युवक ने बताया कि इस नस्ल के कुत्तों को पालने का तरीका अलग होता है। इन्हें अगर ठीक से प्रशिक्षित किया जाए तो ये मजबूत पहरेदार होते हैं। पंजीकरण के लिए नगर निगम की टीम घर आई थी, पर उनके पास फॉर्म नहीं था। चाऊ चाऊ और टॉय पाम नस्ल पाल रहे विनीत चौहान ने बताया कि पहले वह भी रॉटविलर पाल रहे थे, लेकिन हमलों की खबरों के बाद इससे दूरी बना ली। अब परिवार की सुरक्षा प्राथमिकता पर है। टॉय नस्ल ही पाल रहे हैं।
नगर निगम के पशु कल्याण अधिकारी डॉ. हरपाल ने बताया कि पालतू कुत्तों का पंजीकरण किया जा रहा है। टीम भी लोगों को जागरूक कर रही है। अगर कोई व्यक्ति पंजीकरण कराना चाहता है तो वह कार्यालय में संपर्क करे।
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